Wednesday, September 13, 2017

Know about Islam & India at the beginning of Middle Ages. Part-2

Continuously................

उत्तरी भारत के राज्य।

उत्तरी भारत के राज्य- उत्तरी भारत से हमारे यहां तात्पर्य हिमालय की पर्वतमालाओं व विंध्याचल पर्वत की श्रृंखलाओं के मध्य के राज्यों से है। मुसलमानों के आक्रमण के समय इस क्षेत्र में अनेक हिंदू राज्यों का जमघट था। उत्तरी भारत के तत्कालीन उल्लेखनीय राज्य यह थे।

- गांधार प्रदेश-

चंद्रगुप्त मौर्य के समय यह भारत का भाग बन गया था और तब से इस पर क्रमश: क्षत्रिय व ब्राह्मण वंशीय शासक राज्य करते रहे। युवान च्वांग के समय यहां एक क्षत्रिय राजा राज्य करता था और उस वंश का शासक नवीं शताब्दी के अंत तक चलता रहा। इसके उपरांत लगतु मुनि के ब्राह्मण मंत्री ने उसे अपदस्थ कर अपने वंश की स्थापना की। मुसलमान इतिहासकारों ने इसे काबुल का हिंदू शाही राज्य भी कहा है। जयपाल,आनंदपाल आदि राजा इसी वंश के थे। मुसलमानों के दबाव के कारण जयपाल को काबुल की घाटी छोड़नी पड़ी तथा उदभपुर (बेहंद) को अपनी राजधानी बनानी पड़ी। जयपाल एक वीर सैनिक तथा योग्य शासक था। भारत पर उत्तर पश्चिम से होने वाले मुस्लिम आक्रमण का पहला प्रहर जयपाल को ही सहना पड़ा।

-कश्मीर-

उस समय उत्तर में दूसरा हिंदू राज्य कश्मीर था। शंकर वर्मन ने कश्मीर राज्य की सीमाओं का  विस्तार किया। परंतु वह आधुनिक हजारा जिले के लोगों से युद्ध करता हुआ मारा गया। उसकी मृत्यु के उपरांत कश्मीर में अराजकता फैल गई। वहां ब्राह्मणों ने अपने सजातीय यशस्कर को अपना राजा बनाया। परंतु इस वंश में थोड़े समय ही राज्य किया और पर्व गुप्त ने वहां नवीन वंश की नींव डाली। उसका उत्तराधिकारी क्षेमेंद्र बना। उसकी समस्त सत्ता उसकी रानी दिद्दा द्वारा ले ली गई। वह 1003 ईसवी तक शासन संचालन करती रही। अतः महमूद गजनवी के आक्रमण के समय कश्मीर की शासन सत्ता एक स्त्री के हाथ में थी।

-सिंध-

712 ईस्वी में अरब के मुसलमानों ने वहां के राजा दाहिर को परास्त कर सिंध पर अपना अधिकार कर लिया था। परंतु सिंध पर अरब के मुसलमानों का प्रभुत्व स्थाई नहीं रहा। 871 ईस्वी में सिंध ने ख़लीफ़ात से संबंध विच्छेद कर अपने को स्वतंत्र बना लिया था। परंतु वह मुसलमानों के बसे रहने के कारण देश की सुरक्षा की दृष्टि से यह राज्य भी सुदृढ़ नहीं रहा था।

-मालवा-

परमार लोगों ने जो मूलतः आबू के निवासी थे, मालवा को नवी सती में विजय कर लिया था। इस विजय का श्रेय उपेंद्र (कृष्णराज) को जाता है। उसके उत्तराधिकारी हर्ष सिंह ने हूणों से युद्ध किया तथा 972 ईसवी में राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत को लूटा। उसके पुत्र मुंझ (वाक्पति द्वितीय ) ने कर्नाटक तथा चोलों पर विजय प्राप्त कर ली थी। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक भोज माना जाता है, जिसने 1065 इसवी तक शासन किया बताया। परंतु उसकी साम्राज्यवादी सुधा ने उसे पड़ोसी राज्यों से शत्रुता मोल लेने को बाध्य कर दिया।

-गुजरात-

यहां 8 वीं सदी के अंत में 961 ईस्वी तक यादव नरेश शासन करते रहे। इस वंश के अंतिम शासक का उसके दामाद मूलराज द्वारा ही वध कर दिया गया था। मूलराज ने सोलंकी वंश की नींव डाली। जैन इतिहासकारों ने मूलराज की वीरता की अति प्रशंसा की है। परंतु उसकी वीरता केवल रक्षात्मक युद्ध तक ही सीमित रही। महमूद गजनवी ने जिस समय सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया था उस समय वहां भीम राजा राज्य करता था। चाहे भीम महमूद से युद्ध में परास्त हो गया परंतु उसने महमूद के युद्ध में दांत अवश्य खट्टे कर दिए थे।

-उज्जैन-

यहां आठवीं व नवीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहारों का शासन था। 10वीं शताब्दी में भोज के  उत्तराधिकारियों के समय प्रतिहारों की लक्ष्मी क्षीण होने लगी। राष्ट्रकूटों का उत्कर्ष पुनः प्रारंभ हुआ और इंद्र तृतीय ने कुछ काल के लिए कन्नौज पर अधिकार कर लिया। परंतु प्रतिहार लोग अब भी मुसलमानों को भारत प्रवेश से रोक रहे थे। 991 ईस्वी में राज्यपाल ने जयपाल को तथा 1008 ईस्वी में आनंदपाल को मुसलमानों के विरुद्ध सहायता दी। परंतु प्रतिहारों का मुसलमानों के विरुद्ध यह संघर्ष असफल रहा और महमूद गजनवी ने मथुरा व कन्नौज पर अधिकार कर लिया था।

-पूर्व के प्रदेश बंगाल व आसाम-

765-70 ई. में  गोपाल ने पालवंश की स्थापना की। इस वंश के राजा देवपाल ने 39 वर्ष राज्य किया। उसकी मृत्यु के उपरांत पालवंश निर्बल हो गया था। परवर्ती पाल राजाओं ने साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया। इसके परिणाम उनके लिए भी अहितकर सिद्ध हुए। 11 वीं सदी के प्रारंभ में यहां महिपाल प्रथम शासन कर रहा था. उसने अपने शासनकाल में पाल वंश की लुप्त गरिमा को पुनर्प्राप्त करने का प्रयास किया और कुछ क्षेत्र तक वह इस में सफल भी रहा। उस के शासनकाल में सामंत लोग बहुत प्रबल बन गए थे। वे शासक में कठिनाइयां उत्पन्न करते थे तथा वे पाल राजाओं की अधिकता नाम मात्र की मानते थे। इससे बंगाल एक निर्बल प्रदेश बन गया था। परंतु एक दूरस्थ प्रदेश होने के कारण वह महमूद गजनवी के आक्रमण का शिकार नहीं बना। आसाम भी हर्ष के समय भारत का राज्य बन गया था परंतु उनकी मृत्यु होते ही वह एक स्वतंत्र राज्य बन गया। बंगाल से बहुदा उसका संघर्ष चलता रहता था। परंतु अपनी दूरस्थ स्थिति के कारण आरंभ में वह भी मुस्लिम राजनीति का अंग नहीं बन सका।

दक्षिण भारत के राज्य

मुसलमानों के आक्रमणों के पूर्व दक्षिण भारत में भी अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित हो चुके थे। उनमें भी निरंतर संघर्ष करते थे। इस कारण यह राज्य सुरक्षा की दृष्टि से निर्बल बन रहे थे तथा विकासोन्मुख भी न हो सके थे। दक्षिण के राजवंशो में उस समय दो वंश प्रधान थे चालुक्य व राष्ट्रकूट। पुलकेशी द्वितीय चालुक्य वंश का ही नरेश था, जिसने कन्नौज नरेश हर्षवर्धन को युद्ध में परास्त किया था। परंतु 642 ईस्वी में जब वह पल्ल्वों से युद्ध करता हुआ मारा गया तो चालुक्य वंश निर्बल हो गया। इसके अलावा चालुक्य वंश का राष्ट्रकूटों से संघर्ष छिड़ गया। इस संघर्ष में 753 ईसवी में चालूक्यों को ही मुंह की खानी पड़ी। इसके परिणाम स्वरुप राष्ट्रकूट शक्तिशाली अवश्य हो गए। परंतु जब उनका संघर्ष उनके पड़ोसी राज्यों से प्रारंभ हो गया तो उनकी शक्ति भी शनैः शनैः क्षीण होने लगी। इस वंश के गोविंद तृतीय ने अनेक वीरतापूर्ण कार्य किए तथा उसके उत्तराधिकारी इंद्र तृतीय ने तो उतरी भारत तक धावा बोलने का साहस किया। परंतु 973 ईस्वी में यह वंश भी प्रभाव को प्राप्त हुआ और उसका स्थान परवर्दी चालूक्यों ने लिया। चालुक्य वंश के सोमेश्वर प्रथम ने कल्याणी को अपने राज्य की राजधानी बनाई। इस प्रकार 11 वीं सदी में चालुक्य पुन: प्रबल बन गए। परंतु उनके साथ ही चौल राज्य का भी उदय हो गया। अतः अब परवर्दी चालुक्य व चोलों में संघर्ष आरंभ हो गया। 11 वीं शताब्दी के आरंभ में चोल लोगों का प्रभाव दक्षिण भारत में प्रबल हो गया। राम राजा के शासनकाल में तो यह प्रभाव और भी प्रबल व विस्तृत हो गया। उसने केरल, मदुरै, मैसूर, आंध्र तथा कलिंग को विजय किया। उसका पुत्र राजेंद्र एक सफल विजेता सिद्ध हुआ। पर उसकी यह शक्ति भी अस्थाई सिद्ध हुई। इस प्रकार चालूके, राष्ट्रकूट व चोल वंश के पारस्परिक संघर्ष से दक्षिण भारत भी निर्बल बनता गया। परंतु संभवत विंध्याचल पर्वत की उच्च श्रंखलाओं के कारण यह महमूद गजनवी के आक्रमण से सुरक्षित रह गया। इन दोनों में विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनवी को रोकने में उत्तर के राजाओं को सहयोग नहीं दिया।

-सामाजिक अवस्था-

अरब के मुसलमानों द्वारा सिंध पर विजय प्राप्त करने के उपरांत 300 वर्षों तक भारत पर कोई विदेशी आक्रमण नहीं हुआ। इससे भारतवासी देश की सुरक्षा के प्रति उदासीन हो गए। देश पर बाहरी आक्रमण न होने के कारण राष्ट्रीय भावना भी प्रबंल रूप में न रही। विचारों में संकीर्णता होने के कारण भारतवासी विदेशियों से भी अपने संबंध स्थापित नहीं कर सके। इसी कारण वह विदेशों में हो रहे युद्ध के तरीकों से भी अनभिज्ञ बने रहे। भारतवासी अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ समझते थे। अलबरूनी जो एक अरब यात्री था और महमूद गजनवी के साथ भारत आया था, वह भारत की तत्कालीन सामाजिक अवस्था के विषय में इस प्रकार लिखता है-- " हिन्दुओ की धारणा यह है कि हमारे जैसा देश, हमारी जैसी जाति, हमारे जैसा राजा, धर्म, ज्ञान और विज्ञान संसार में कहीं नहीं।” वह यह भी लिखता है कि हिंदुओं के पूर्वज इतने संकीर्ण विचारों के नहीं थे जितने इस युग (११ वीं सदी) के लोग थे। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि-- “ हिंदू लोग यह नहीं चाहते कि जो चीज एक बार अपवित्र हो चुकी है, उसे पुनः शुद्ध करके अपना लिया जावे।” हिंदुओं के इन संकीर्ण विचारों का परिणाम यह हुआ कि भारत विश्व के अन्य देशों से विलग बना रहा। अन्य देशों के सांस्कृतिक विचार भारतीय संस्कृति में प्रवेश नहीं कर सकी। इसका परिणाम यह हुआ कि नवी व 10 वीं सदी में भारतीय संस्कृति गतिहीन हो रही थी।
प्रोफेसर श्रीराम शर्मा ने तत्कालीन भारतीय सामाजिक अवस्था पर इस प्रकार लिखा है- चारों वर्ण अब  स्थिर हो चुके थे। समाज में ब्राह्मण व राजपूतों (क्षत्रियों) का आदर अधिक था। अलबरुनी के आधार पर वे लिखते हैं कि ब्राह्मण उस समय न तो कर ही देते थे और ना राजा की कोई सेवा ही करते थे। ब्राह्मण अपनी जाति के अलावा किसी से विवाह नहीं करते थे। चांडाल, डॉम व ढाढी, उस समय समाज में सबसे निम्न गिने जाते थे। नाविक, बाधिक, जुलाहे, मोची भी नीची जाति के समझे जाते थे। पर्दा प्रथा उस समय विद्यमान थी। स्त्रियां सामाजिक कार्य में अपने पति के साथ भाग लेती थी। देश की अधिक जनसंख्या ग्रामों में निवास करती थी। ग्रामवासी बहुदा स्वावलंबी जीवन व्यतीत करते थे।
भारत वासियों की तत्कालीन विचारों की संकीर्णता तथा सामाजिक ऊंच-नीच की भावना के आधार पर डॉक्टर ए एल श्रीवास्तव अपना मत इस प्रकार व्यक्त करते हैं-- “अपने से भिन्न जातियों और संस्कृति से संपर्क नहीं रहने के कारण हमारी सभ्यता गतिहीन होकर सड़ने लगी। वास्तविकता तो यह है कि इस युग में हमारे जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में पतन के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने लगे।” इस युग में संस्कृत साहित्य भी उतना सजीव व रुचिपूर्ण नहीं रहा था। कला के क्षेत्र में भी विकास रुक गया था। समाज में विधवा स्त्रियों का जीवन अति नियंत्रित था।

-धार्मिक अवस्था- 

धर्म भारत में प्रारंभ से ही प्रधान रहा है। यह जीवन के प्रति दृष्टिकोण को निर्धारित करता है तथा भारतवासियों के आचरण का नियमन करता है। इसी भावना से प्रेरित होकर प्राचीन काल में हिंदू नरेश युद्ध करते तथा विशाल एवं भव्य देवालय बनवाते थे। वीर क्षत्राणियां धधकती भयंकर ज्वालाओं का सहर्ष आलिंगन इसी भावना से प्रेरित होकर करती थी। भारत की यह धार्मिक भावना ही थी जिसने की विभिन्न प्रांतों की भिन्नता दूर कर समस्त भारतवासियों में एकता की भावना उत्पन्न कर उनका जीवन दर्शन एक ही रखा।
धार्मिक सहिष्णुता भी भारत का सदैव अपूर्व गुण रहा है। परंतु मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व जैन धर्म और बौद्ध धर्म पराभव को प्राप्त हो रहे थे। स्वामी शंकराचार्य के प्रयासों से हिंदू धर्म फिर उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा था। उन्होंने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया था। उनका कहना था कि ब्रह्म और जीव में कोई अंतर नहीं है। जीव माया के वशीभूत होकर अपने को ब्रह्म से अलग मानता है। स्वामी शंकराचार्य के प्रादुर्भाव से पूर्व भक्ति आंदोलन प्रारंभ हो चुका था। दक्षिण में इसका प्रसार आलवार संत कर रहे थे। बोध धर्म में 'वज्रयान' संप्रदाय का जन्म हो चुका था। उसके अनुयाई मूल सिद्धांतों को छोड़कर रहस्यमई क्रियाओं तथा गुह्या सिद्धियों की साधना में विश्वास करने लगे थे। दक्षिण भारत में लिंगायत संप्रदाय का भी प्रादुर्भाव हो गया था। वे लोग शिव को ही परमेश्वर मानते थे। जाति व्यवस्था में इन लोगों का विश्वास नहीं था। वे हिंदू धर्म के ब्रम्हचार्य, यज्ञ, व्रत-उपवास तथा तीर्थ आदि में विश्वास नहीं करते थे। कुछ हिंदू नरेश अन्य उदीयमान संप्रदाय के अनुयाई बन रहे थे। वैष्णव धर्म का प्रभाव निःसंदेह समस्त भारत में अधिक था। पर शैव व शक्ति संप्रदायों के अनुयाई इस समय पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थे। अल बरुनी जो 11 वीं शताब्दी में पंजाब में था, लिखता है-- “ हिंदू लोग एक भगवान में विश्वास करते थे और उसे भी निर्विकार एवं सर्व शक्तिशाली मानते थे। परंतु साधारण लोग भगवान के विभिन्न विचार रखते थे। उनमें से कुछ घृणित है। वे भगवान को स्त्री, पुत्री व पुत्र की भी बात करते हैं। मूर्ति पूजा यद्दपि उस समय आम थी, पर वह अशिक्षित, साधारण व निम्न श्रेणी की  मनुष्य तक ही सीमित थी।" वाम मार्गी संप्रदाय भी उस युग में जोर पकड़ते जा रहे थे। बंगाल व कश्मीर इन वाम मार्गी संप्रदाय के गढ़ बने हुए थे। इस के अनुयाई मध-पान, मांस भक्षण तथा व्याभिचार जैसे व्यवसनो को सहर्ष अंगीकार करते जा रहे थे। इस प्रकार चार्वाक के सिद्धांत देश में पुनः पनपने लगे थे। यहां तक कि कई विश्वविद्यालय भी इन दुर्व्यसनों के शिकार बन रहे थे। उनमे बिहार का विक्रमशिला विश्वविद्यालय प्रमुख था। इनके अलावा बोद्ध मठ भी विलास के केंद्र बनते जा रहे थे। सन्यासियों का महत्व समाज में दिनों दिन घट रहा था। देवालयों में 'देवदासी' की प्रथा प्रबल बनती जा रही थी। इस प्रथा के अंतर्गत अनेक अविवाहित लड़कियां देवालयों में रखी जाती थी। इससे देवालय भी विलासिता व भ्रष्टाचार के केंद्र बनते जा रहे थे। अश्लीलता पर आधारित तांत्रिक साहित्य भी उस समय जन साधारण के समक्ष आ रहा था। विख्यात विद्वान भी इस प्रकार के (अश्लीलता पर आधारित) ग्रंथ लिखने में नहीं हिचकते थे। संस्कृत के विद्वान क्षमेन्द्र ने 'समय-मंत्रक'  (वेश्या की आत्मकथा) नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में नायिका अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव का वर्णन करती है। इन सब का परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों के भारत आने से पूर्व भारत वासियों के जीवन में नैतिकता दिनों दिन गौण बनती जा रही थी। परंतु यह सब होते हुए भी भारतवासियों में आध्यात्मिक दृष्टिकोण अभी अपना स्थान जमाए हुए था और इसका श्रेय तत्कालीन विभिन्न धार्मिक आचार्य को ही जाता है। इनमें कुमारिल भट्ट (700 ईस्वी), पूर्व शंकराचार्य (800 ईसापूर्व), रामानुजाचार्य (1100 ई) आदि प्रमुख हैं। इन धार्मिक आचार्यों ने भारत वासियों को भक्ति का मार्ग दिखाया, जिसके कारण आगे भारत में भक्ति आंदोलन प्रबल रूप से प्रसारित हुआ।

-आर्थिक अवस्था-

आर्थिक दृष्टि से देश उस समय समुन्नत था। अपने प्रचलित व्यवसायों से लोगों ने प्रचुर मात्रा में धन संकलित कर लिया था। कृषि तो उस समय जनसाधारण का मुख्य व्यवसाय था ही। इसके अलावा विभिन्न पदार्थों की खाने उस समय खोदी जाने लगी थी। कुटीर व्यवसाय अति उन्नत एवं विकसित था। देवालय धन के भंडार बने हुए थे। यद्यपि उस समय समाज दो वर्गों में विभक्त था।

1. समृद्धि वर्ग

2. निर्धन वर्ग

फिर भी जनसाधारण सुखी था। बेकारी व भुखमरी उस समय भारत में व्याधि रूप में विद्यमान न थी।  भारतवासी सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते थे। व्यापारी वर्ग शासक वर्ग की भांति विलासिता का जीवन व्यतीत करता था। परंतु साथ में ही वे दानी व उदार भी होते थे। उनकी इस उदार वृत्ति के कारण ही देवालय उस काल में संपदा एवं वैभव के केंद्र बने हुए थे और विदेशों में देश की यह संपनता ही चर्चा का विषय बनी हुई थी। पर गांव के लोग इतने संपन्न नहीं थे। निर्धारित दिवस पर वे समीप के नगर में जाकर अपना उत्पादित सामान बेचते थे। यह लोग प्रायः मितव्ययी एवं संतोषी होते थे। परंतु उस समय हीं तो यातायात के साधन ही विकसित थे और मार्ग ही अधिक सुरक्षित थे। इस कारण व्यापार में बड़ी कठिनाई उत्पन्न होती थी। बनारस, हरिद्वार, इलाहाबाद कांजीवरम उस समय पवित्र स्थान तो थे ही, पर साथ में वे व्यापार के भी केंद्र बने हुए थे। इस प्रकार देश धन-धान्य से परिपूर्ण था, पर उस अपार संपदा की सुरक्षा की उस समय कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। इसी कारण विदेशियों को भारत की अतुल संपदा लूटने का साहस हुआ तथा भारत के उत्तर पश्चिम से निरंतर मुसलमानों के आक्रमण होने लगे। महमूद ग़ज़नवी का भारत पर आक्रमण करने का मुख्य उद्देश्य भारतीय की अतुल संपदा को लूटना था।

The end of India at the beginning of Middle Ages 


Conclusion:-I need your point of view. Please tell me by commenting There may have been some mistake in doing critical analysis. Please suggest me.

No comments:

Post a Comment

आपके बहुमूल्य सुझाव मेरा हमेशा मार्गदर्शन करेंगे।