Tuesday, September 19, 2017

Mohammed Gauri, the founder of the Muslim Empire in India-मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान

Muhammad Ghori
Muhammad Gori


भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक मोहम्मद गौरी

गौर वंश का उत्कर्ष


महमूद गज़नवी ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना अवश्य की थी, पर उस विशाल साम्राज्य में बसने वाली विभिन्न जातियों को वह एकता के सूत्र में नहीं हो सका था . अतः उसकी मृत्यु के बाद जब उसके निर्मल उत्तराधिकारी उस विस्तृत साम्राज्य को नहीं संभाल सके, तो वह विभिन्न जातियां(सेल्जुक,तुर्क,,गज तुर्कमान,,गौर अफगान)गजनी से स्वतंत्र होने लगे।  इस क्षेत्र में सर्वप्रथम सेल्जुक तुर्कों ने  सर उठाया और उन्होंने खुरासान पर अधिकार कर अपने एक विशाल एवं स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।  कुछ समय बाद गौर व ख्वारिज्म का नवीन साम्राज्य स्थापित हुआ और सेल्जुक तुर्कों का स्थान गोर जाति ने ले लिया।
गौर लोग गौर राज्य के निवासी थे।  गौर गजनी और हिरात के मध्य एक छोटा सा पहाड़ी राज्य था, जिस पर महमूद गजनवी ने 1009 ईस्वी में अधिकार कर लिया था।  गौर का तत्कालीन शासक महमूद बिन सूरी महमूद का सामंत बन गया था। महमूद की मृत्यु के उपरांत जब गौर राज्य ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया तो गजनी के सुल्तान बहराम ने उस राज्य के राजकुमार मलिक कुतुबुद्दीन हसन का वध कर दिया। इस पर उसके भ्राता सैफुद्दीन सूरी ने गजनी पर आक्रमण कर बहराम को प्राप्त कर दिया। इस पर गजनी और गौर दोनों राज्यों के बीच संघर्ष हो गया।  सैफुद्दीन के छोटे भाई अलाउद्दीन ने गजनी पर आक्रमण कर दिया।  उसने गजनी को लूटा ही नहीं वरन, उसे अग्निदेव की भेंट चढ़ा दिया तथा उस सुंदरनगर के वैभव को धूल में मिला दिया।  कर्नल जे वी मेलिसन अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ अफगानिस्तान’ में लिखते हैं--”महमूद तथा उसके उत्तराधिकारियों द्वारा निर्मित गजनी का सुंदर नगर अग्नि की भीषण ज्वाला,  कत्ल तथा विनाश के लिए छोड़ दिया गया।  गजनी वंश के शासकों की समस्त यादें नष्ट कर दी गई।  उनके प्रत्येक चिन्ह मिटा दिए गए।  7 दिन तक वहां कत्लेआम, लूट व जलाना चलता रहा। “

इस आक्रमण की भयंकरता पर फरिश्ता लिखता है--” जब अल्लाउद्दीन गजनी से विदा हुआ तो अपने साथ गजनी के आदरणीय मनुष्यों को बंदी बनाकर विजय के चिन्ह स्वरूप गौर ले गया और वहां उनके गले कटवाकर उनके रक्त से रंजीत भूमि से नगर की दीवारों पर प्लास्टर करवाया गया। “ किसी का अनुमोदन सर वुल्जाले एक करता है।1161 ईस्वी में अल्लाउदीन की मृत्यु हो गई और उसका दूसरा भाई सैफुद्दीन गद्दी पर बैठा।  उसकी मृत्यु के पश्चात 1163 ईस्वी में गियासुद्दीन गोर का सुल्तान बना।  वह एक वीर सुल्तान था। परंतु ख़वारिज  के सुल्तान से वह परास्त हुआ। इसके परिणाम स्वरुप गौर का साम्राज्य कम हो गया।  इसी सुल्तान ने अपने भाई साहबूद्दीन उर्फ मुईजुद्दीन मोहम्मद को गजनी का सूबेदार नियुक्त किया और वही आगे चलकर मोहम्मद गौरी के नाम से विख्यात हुआ, जिसने मोहम्मद गजनवी की भांति भारत पर अनेक आक्रमण किए तथा गजनी के साम्राज्य को भी महमूद की भांति ही विस्तृत किया। मोहम्मद अपने जेष्ठ भ्राता गयासुद्दीन गौर के प्रति सदैव कृतज्ञ रहा तथा सिक्कों पर भी उसका नाम उत्कीर्ण करता रहा।
अब प्रश्न यह प्रस्तुत होता है कि यह गौर थे कौन? इस प्रश्न का समाधान विभिन्न इतिहासकारों ने अपनी विभिन्न प्रकार की धारणाओं द्वारा करने का प्रयास किया है।  गौर के शासक अपने नाम के अंत में ‘सूरी’ शब्द लगाते थे।  इस शब्द के आधार पर कुछ इतिहासकार उन्हें अफगान मानते हैं।  इस दिशा में इतिहासकार डॉर्न व एलफिंस्टन के नाम उल्लेखनीय है। जे बी मेलिसन उन्हें उस जाति का वंशज मानता है, जिसने 1010 ईस्वी के भारत आक्रमण के उपरांत लौटते हुए महमूद की सेना को लूटा था।  परंतु सर वुल्जाले हेग  की मान्यता है कि वे बलख के समानियो  की भांति पूर्वी पारसी थे। डॉक्टर अवध बिहारी पांडेय भी इसी मत का समर्थन करते हैं।

मुहम्मद गौरी के भारत आक्रमण के उद्देश्य--


महत्वकांक्षी एवं साम्राज्य साम्राज्यवादी होना-- मोहम्मद गौरी भी महमूद ( महमूद गजनबी ) की भांति एक महत्वाकांक्षी एक साहसी युवक था।  वह दूसरे देशों को विजय कर अपना गौरव बढ़ाने के लिए सदैव आतुर रहता था।  इसी कारण उसने भारत पर आक्रमण किया।  इसके अलावा वह गजनी के तत्कालीन राज्य से संतुष्ट न था  पश्चिम की ओर बढ़ कर वह अपने जेष्ठ भ्राता को अप्रसन्न करना नहीं चाहता था इस कारण भी उसने पूर्व की ओर ही बढ़ना श्रेयस्कर समझा।
  1. पंजाब पर अपना अधिकार समझना-- मोहम्मद गौरी महमूद ग़ज़नवी (महमूद के 17 आक्रमण)  के राज्य का स्वामी बना था। पंजाब पर महत्व उसके उत्तराधिकारियों का आधिपत्य रह चुका था।  गौर वंश के सुल्तानों से परास्त हो, गजनी के सुल्तान  अब भी पंजाब में शरण लेने आ जाया करते थे।  इस पर मोहम्मद गोरी ने पंजाब पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिलाना अपना परम कर्तव्य समझा।
  2. अपने राज्य को सुरक्षित करना-- मोहम्मद गौरी जब गजनी का सुल्तान बना था, उस समय पंजाब पर महमूद का वंशीय खुशरब मलिक शासन कर रहा था।  अतः मोहम्मद को भय था कि कभी महमूद के वंशज गजनी को पुनः प्राप्त करने का प्रयास न कर बैठे।  इसके अलावा ख्वारिज्म के शाह से भी गौर वंश के संबंध उस समय अच्छे न थे।  अतः इन दोनों शत्रुओं से अपने राज्य को सुरक्षित रखने हेतु पंजाब पर अधिकार करना मोहम्मद ने परम आवश्यक समझा।
  3. इस्लाम का भारत में प्रसार करना-- महमूद की भांति मोहम्मद गौरी भी इस्लाम का प्रचार कर इस्लाम जगत में अपना नाम कमाना चाहता था।  इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे भारत ही उपयुक्त स्थान दृष्टिगत हुआ।  परंतु यह स्वीकार करना पड़ता है कि धर्म के क्षेत्र में वह महमूद की भांति कट्टर नहीं था। धर्म को उसने अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बनाया, जिससे कि वह अपने सैनिकों में युद्ध के लिए उत्साह उत्पन्न कर सका। 
  4. धन प्राप्ति के लिए-- मध्यकालीन अन्य शासकों की भांति मोहम्मद गोरी भी दूसरे देशों से धन प्राप्त कर अपने साम्राज्य को विस्तृत कर उसे सामरिक साधनों से सुसज्जित रखना चाहता था।  इसी कारण उसने राज्यों की राजधानियों पर आक्रमण न कर उसके समृद्धिशाली नगरों तथा प्रसिद्ध व धन्य-धन्य से पूर्ण मंदिरों को ही अपने आक्रमणों का लक्ष्य बनाया। 
  5. भारत में मुस्लिम साम्राज्य का विस्तार-- मुहम्मद की यह धारणा थी कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हेतु अरब के मुसलमान तथा महमूद के उत्तराधिकारियों ने पर्याप्त प्रयास नहीं किया।  वह इस कमी को पूरा कर भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना करना चाहता था।  इसीलिए उसने भारत पर अनेक आक्रमण किए। 

मोहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक अवस्था--

जिस समय मोहम्मद गोरी ने भारत पर मुहम्मद की भांति निरंतर आक्रमण करना आरंभ किया था,उस समय भारत की राजनीतिक अवस्था संतोषप्रद नहीं थी।  उस समय समस्त उत्तरी भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभक्त था। अधिकांश राज्य राजपूत नरेशो शासित होते थे।  परंतु सीमांत प्रदेश अब मुस्लिम शासकों के प्रभुत्व में आ गए थे।  पंजाब महमूद गजनवी के वंशजों से शासित हो रहा था और लाहौर उसकी राजधानी थी।  सिंध का दक्षिणी भाग इस्लामिया शियाओं द्वारा शासित हो रहा था।  उनका प्रधान नगर मुल्तान था।  यह सही है की इन दोनों राज्यों के साधन सीमित थे और वहां की हिंदू जनता का सहयोग भी उन्हें प्राप्त नहीं था।  इस कारण उनका उनके सह जातियों की ओर झुकाव होना स्वाभाविक था।

उत्तरी भारत के शक्तिशाली राजपूत राज्य भी अब निर्बलता को प्राप्त हो रहे थे।  गुर्जर प्रतिहारों का प्रभुत्व विनष्ट हो चुका था। चौहान वंश दिल्ली व अजमेर प्रशासन कर रहा था। यह राजपूत वंश उन राजपूत कुलों में से एक था, जिन्होंने अग्नि के समक्ष भारत में तुर्कों को न घुसने देने की प्रतिज्ञा की थी।  इस वंश के अजय राम ने 12वीं शताब्दी के प्रथम चरण में अजमेर नगर बसाया था।  1153 ईस्वी में विग्रहराज वीसलदेव इस वंश का प्रतापी राजा हुआ।  उसने 1164 इसवी तक राज्य किया।  अपने शासनकाल में उसने गहड़वालों से दिल्ली जीत लिया था। पृथ्वीराज चौहान इसी वंश का प्रतापी शासक था, जो बीसलदेव के उत्तराधिकारी सोमेश्वर की मृत्यु के पश्चात 1177 ईस्वी में गद्दी पर बैठा था।  यह पृथ्वीराज तृतीय के नाम से भी जाना जाता है।  वह अपनी वीरता है एवं अदम्य उत्साह के लिए समस्त उत्तरी भारत में विख्यात था।  वास्तव में वह अपने समय का सर्वोच्च वीर पूण्डगव था। राज्य सिंहासन पर बैठते ही उसने अपने साम्राज्य का विस्तार प्रारंभ कर दिया।  इस कारण उसे कन्नौज के शासक जयचंद से संघर्ष करना पड़ा।  जयचंद की पुत्री संयोगिता का स्वयंवर से जब पृथ्वीराज बलपूर्वक हरण करके ले गया तो उनकी शत्रुता और भी प्रबल हो गई।  पृथ्वीराज ने चंदेल वंशीय परमर्दिन से भी युद्ध किया।  समृद्धि विस्तार के कारण ही उसे चालुक्य वंश के भीम द्वितीय से भी युद्ध करना पड़ा था।  अतः स्पष्ट है कि यह राजपूत नरेश अपने प्रभाव को विस्तीर्ण एवं व्यापक बनाने हेतु परस्पर युद्ध किया करते थे और वह उस समय भारत के लिए दुर्भाग्य की बात थी, क्योंकि उन्हीं दिनों मोहम्मद ग़ोरी भारत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था।  बिहार में उस समय पालवंश तथा बंगाल में सेन वंश राज्य कर रहा था।  बंगाल का राजा उस समय लक्ष्मण सेन ( 1179 से 1205 ईसवी) था। वह अपने पितामह विजय सिंह की भांति एक विजेता था।  उसने साम्राज्य विस्तार हेतु पृथ्वीराज चौहान की भांति अनेक युद्ध किए और वह मोहम्मद गौरी को पूर्वी भारत में बढ़ने में बाधक सिद्ध हुआ।
दक्षिण भारत भी उत्तरी भारत की भांति छोटे-छोटे राज्य में विभक्त था।  वहां भी सार्वभौम शक्ति का अभाव था। देवगिरी में यादव वंश, वारंगल में काकतीय वंश, द्वारसमुद्र में होयसल वंश तथा मथुरा में पांडे वंश राज्य कर रहे थे।  इन राज्यों में भी परस्पर संघर्ष होते रहते थे।  अतः वहां भी राजनीतिक एकता का अभाव था।

अतः स्पष्ट है कि उस समय भारत की राजनीतिक अवस्था मोहम्मद गौरी के अनुकूल थी।  भारत में राजपूत नरेश व्यर्थ की मान मर्यादा की रक्षा हेतु परस्पर लड़ने में अपना गौरव समझते थे।  उन्होंने कभी भी देश की सुरक्षा हेतु संयुक्त रक्षापंक्ति बनाने का विचार नहीं किया।  इसीलिए मुस्लिम आक्रमणकारी सुगमता से खैबर व बोलने के दरों को पार कर भारत पर सदियों तक सुगमता से आक्रमण करते रहे।

मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण--

सन 1173 ई. में मुहम्मद गौरी गजनी का सूबेदार नियुक्त हुआ और इसके उपरांत ही उसने समीप के भागों पर धावा बोलना प्रारंभ कर दिया। 1175 ईस्वी में उसने मुल्तान को अपने अधीन कर लिया।  मुल्तान पर उस समय करमाथी लोग शासन कर रहे थे। वे गजनी सुल्तान द्वारा इस्लाम द्रोही माने जाते थे, अतः वहां उसने अपने धर्म के पक्के अनुयाई को सूबेदार नियुक्त किया।

इसके उपरांत उसने सिंध स्थित डच पर आक्रमण किया। वहां उस समय भट्टी राजपूत राजा राज करता था। सर वुल्जले हैग के अनुसार वहां के राजा और उसकी रानी ही नहीं संबंध अच्छे नहीं थे। रानी अपनी पुत्री सहित सुल्तान के चक्कर में फंस गई। उसने अपने पति को विश दिलवाकर उसका वध करवा दिया तथा किला आक्रमणकारी के हवाले कर दिया। रानी और उसकी पुत्री भी अंत में दुख की मौत ही मरी। परंतु डॉक्टर आशीर्वाद लाल का कहना है कि वर्तमान के अनुसंधान ने इस कहानी को गलत सिद्ध कर दिया है।

1178 ईस्वी में मुल्तान ने अन्हिलवाडा़ पर आक्रमण किया। वहां के नवयुवक राजा ने उसे अपनी राजधानी पाटन पर करारी मात दी। यह मोहम्मद गोरी की भारत में प्रथम पराजय थी। इस पराजय से मोहम्मद गौरी इतना आतंकित हुआ कि वह 20 वर्ष तक गुजरात की ओर आंख उठाकर नहीं देख सका। 1182 ई०में सुल्तान ने निचले सिंध पर आक्रमण किया। यहां से उसे अतुल धन मिला, जिसकी सहायता से उसने एक विशाल सेना का गठन किया। इस विजय से उसने सारे सिंध पर अधिकार कर लिया। 1185 ईस्वी में उसने लाहौर पर दूसरी बार आक्रमण कर वहां के शासक खुशरव मलिक को प्रारास्त कर संपूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया।

मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान।

सुल्तान और पंजाब पर अधिकार हो जाने के उपरांत मोहम्मद गोरी ने हिंदुओं के विरुद्ध अपनी योजना को क्रियान्वित करने की तैयारी की। अतः वह भटिंडा की ओर अग्रसर हुआ। 1189 ई० मे सुल्तान ने पृथ्वीराज चौहान के देखते-देखते भठिंडा पर अधिकार कर लिया। वहां जियाउद्दीन के नेतृत्व में 12000 सैनिक छोड़ कर वह स्वयं गजनी की ओर चल पड़ा। परंतु मार्ग में ही जब उसने सुना कि पृथ्वीराज चौहान ने भटिंडा पर आक्रमण कर दिया है तो वह वापस लौट आया तथा तराईन के मैदान में (1191 ई०) प्रतापी हिंदू नरेश पृथ्वीराज चौहान से जूझ पड़ा। यह तराइन का विख्यात मैदान कुरुक्षेत्र के समीप करनाल जिले में सरहिंद के पास स्थित है। राजपूत मुसलमानों पर भूखे शेर की भांति टूट पड़े। मुसलमान युद्धभूमि से नौ दो ग्यारह हो गए। स्वयं सुल्तान घायलावस्था में युद्ध भूमि से प्राण बचाकर गजनी की ओर भाग खड़ा हुआ। इस पराजय से सुलतान बहुत दुखी हुआ।  फरिश्ता नहीं लिखा है--” बदला लेने का निश्चय कर उसने नींद और आराम को अपने लिए हराम बना दिया। “ उसने अपनी सेना को पुनः संगठित किया और लगभग 120000 सैनिकों के साथ अपनी पराजय के दाग को धोने के लिए 1192 ईस्वी में ही पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करने पुनः तराइन में आ डटा। पृथ्वीराज चौहान भी पूरी तैयारी के साथ शत्रु से युद्ध करने मैदान में आ डटा।  मिनहाज उस सिराज लिखता है कि “ सुल्तान ने अपनी सेना को योजनानुसार खड़ा किया। “ राजपूतों ने अत्यंत वीरता से युद्ध किया।  परंतु इस बार मुहम्मद की युद्धनीति के आगे राजपूतों को घुटने टेकने पड़े।  पृथ्वीराज का प्रथम तराइन के युद्ध में कीर्ति प्राप्त सेनापति खांडेराव इस युद्ध में मारा गया। राजपूत सेना भाग खड़ी हुई और पृथ्वीराज चौहान स्वयं युद्ध में काम आ गया।  कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि उसे अजमेर ले जाकर मारा गया।  इस मत के प्रतिपादक हसन निजामी माने जाते हैं।  कुछ का कहना है कि पृथ्वीराज युद्ध भूमि से भागने में सफल हो गया था।  पर वह सरस्वती के निकट पकड़ लिया गया था और फिर मौत के घाट उतार दिया गया था। ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु गजनी में मानी जाती है।  पर इस विषय में अन्य प्रमाण प्राप्त नहीं होते।


पृथ्वीराज की पराजय के कारण।

पृथ्वीराज अपने समय का एक महान विजेता एवं योद्धा था।उसने विभिन्न युद्ध में विजय प्राप्त कर अपने समकालीन नरेश ऊपर अपनी धाक जमा ली थी।  वह सूर सैनिकों, चंदेलों व आबू के परमाणु को प्राप्त कर चुका था। इन सबके अलावा 1191 ईस्वी में तराइन के मैदान में ही वह मुहम्मद गौरी को भी धूल चटा चुका था।  उसकी सेना भी मोहम्मद गौरी से कम एवं निर्मल नहीं थी।  फरिश्ता के अनुसार तो उसकी सेना 300000 अश्वारोही तथा 3000 हाथियों से युक्त थी। खैर, उसके पास इतनी विशाल सेना तो नहीं थी। परंतु फिर भी उसकी 1192 ईस्वी की पराजय इतिहासकारों को आश्चर्य के सागर में निमग्न कर उन्हें उसकी पराजय के कारणों पर चिंतन करने को बाध्य कर देती है।  उनके विश्लेषण से उसकी पराजय के प्रमुख कारण निम्नलिखित दृष्टिगत होते हैं।


  • पृथ्वीराज का अति महत्वाकांक्षी होना-- निसंदेह एक शासक को महत्वाकांक्षी होना चाहिए।  पर पृथ्वीराज चौहान अपने सामर्थ्य से अधिक महत्वकांक्षी था।  उसने अपनी शासन के अल्प समय में ही उत्तर भारत के कई नरेशो को परास्त कर उन्हें नाराज कर दिया था। इस कारण वह इस युद्ध में उनकी सहायता प्राप्त नहीं कर सका।
  • अदूरदर्शी होना-- इसमें कोई संदेह नहीं कि पृथ्वी राज चौहान एक अपूर्व योद्धा था।  पर उसमें दूरदर्शिता का अभाव था।  यदि उसमें यह अवगुण नहीं होता तो वह 1187 ईस्वी में ही मोहम्मद गौरी के विरुद्ध गुजरात के चालुक्य नरेश की सहायता कर देता तो संभवत: मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण करने के हौसले पस्त हो जाते और वह अपना सा मुंह लेकर गजनी लौट जाता। इस पराजय के उपरांत संभवत: वह भारत पर आक्रमण करने की नहीं सोचता।
  • तराइन के प्रथम युद्ध के उपरांत पृथ्वीराज का सजक न रहना-- राजनीति बताती है कि शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए और शत्रु का जब तक पूर्ण विनाश नहीं कर दिया जाए विश्राम नहीं लेना चाहिए।  पृथ्वीराज 1191 ईस्वी की विजय के उपरांत मोहम्मद गोरी के पीछे हाथ धो कर नहीं पड़ा।  यदि उस समय ही वह उसका पीछा करता और गजनी पहुंचने से पूर्व यही उसको समाप्त कर देता तो 1192 ईस्वी मैं उसे पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता।
  • युद्ध के समय शत्रु की बात पर विश्वास करना-- युद्ध के समय कभी भी शत्रु द्वारा फैलाई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पृथ्वीराज को युद्ध में बेटा देखकर मोहम्मद गोरी ने चालाकी से यह खबर फैला दी कि वह अपने भाई के आने से पूर्व युद्ध प्रारंभ नहीं करेगा।  भोले राजपूत व उनके स्वामी मुसलमानों की बातों में आ गए।  यही कारण था कि जब प्रातकाल मोहम्मद गोरी ने चौहान की सेना पर आक्रमण किया तो बहुत से राजपूत निद्रा में सोए हुए थे।
  • मोहम्मद गौरी की युद्ध नीति-- मोहम्मद गोरी ने तराइन का यह दूसरा युद्ध एक योजनाबद्ध तरीके से लड़ा।  उसने अपनी सेना के मुख्य अंग को पीछे रखा।  हाथी भी इसी अंग में शामिल थे। घुड़सवारों को आगे बढ़ाया तथा कुछ सैनिक रिजर्व के रूप में पीछे रख दिए।  जब अश्वारोहीयों के प्रहार से राजपूत सैनिक थक गए,तो रिजर्व मुस्लिम सैनिकों ने अचानक हमला बोल दिया और वीरता से युद्ध करते हुए राजपूतों को परास्त कर दिया। 

तराइन के युद्ध के परिणाम--

तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के परास्त हो जाने से केवल चौहान वंश का ही पराभाव नहीं हुआ,वरन भारतीय इतिहास का ही एक युग समाप्त हो गया।  इसीलिए भारतीय और पाश्चात्य देशों के प्रमुख इतिहासकारों ने इसे एक निर्णायक युद्ध माना है।  इस युद्ध की तुलना पानीपत के तीनों युद्धो से की जा सकती है।जब भारतीय इतिहास में इस युद्ध को इतना महत्वपूर्ण समझा गया है तो उसके परिणाम भी महत्वपूर्ण हीं होनी चाहिए। उनमें से कतिपय निम्नलिखित हैं--


  1. पृथ्वीराज चौहान की इच्छाओं पर तुषारापात-- जैसा की मैं इससे पूर्व स्पष्ट कर आई हूं कि पृथ्वीराज एक महत्वाकांक्षी शासक था। वह स्वयं समस्त उत्तरी भारत का एक छत्र शासक बनना चाहता था।  पर उसकी इस  पराजय ने इस प्रकार की सारी इच्छाओं पर पानी फेर दिया। 
  2. यह पराजय राजपूत शक्ति पर एक प्रबल आघात सिद्ध हुई-- इस युद्ध से पूर्व क्या भारत और क्या भारत के बाहर राजपूतों की रणकुशलता एवं वीरता की बड़ी धाक जमी हुई थी। परंतु इस पराजय ने राजपूतों की कीर्ति को धूल में मिला दिया।  अब वे एक वीर जाति के रूप में नहीं रहे।  इस पराजय के उपरांत उन्हें निरंतर मुसलमानों से युद्ध में  टक्कर अवश्य लेनी पड़ी, पर उनसे वे निरंतर परास्त ही होते रहे।  इसीलिए डॉक्टर ईश्वरी प्रसाद ने इस युद्ध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है--: यह राजपूत शक्ति पर आघात था।  इससे भारतीय समाज के सभी अंगों का नैतिक पतन आरंभ हो गया और ऐसा कोई राजपूत नहीं रह गया, जो मुस्लिम आक्रमण को रोकने के लिए अन्य राजाओं को अपने झंडे के नीचे एकत्रित करता। 
  3. इस पराजय ने मुसलमानों की विजय को सुनिश्चित बना दिया-- इस युद्ध में विजयी हो जाने के उपरांत मुहम्मद गौरी भारत में अपनी विजय सुनिश्चित समझने लगा।  वह अपने मार्ग का कांटा केवल पृथ्वीराज चौहान को ही समझता था।  जब पृथ्वीराज इस युद्ध में साफ हो गया तो मोहम्मद अन्य नरेशो से निश्चिंत हो गया। इस युद्ध की पराजय से राजपूत इतने हतोत्साह हुए कि वे भविष्य में कभी मुसलमानों के विरुद्ध एक होकर युद्ध नहीं कर सके। इसीलिए मोहम्मद गौरी के उपरांत भी जितने मुस्लिम आक्रमणकारी भारत आए वे सब विजयी होते चले गए। इसीलिए इतिहासकार एच सी राय चौधरी ने इस युद्ध को निर्णायक एवं मुस्लिम विजय में सहायक बताया है। 
  4. इस पराजय से भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हो गई-- जिस प्रकार पानीपत के प्रथम युद्ध में भारत में मुगल वंश की स्थापना कराई थी तथा पानीपत के तीसरे युद्ध में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव डालने मैं सहायता दी, उसी प्रकार इस युद्ध की पराजय से भारत में मुस्लिम साम्राज्य (भारत पर तुर्कों के आक्रमण) की स्थापना हो गई।  इसलिए डॉक्टर ए एल श्रीवास्तव ने इसे भारतीय इतिहास में एक युगांतकारी घटना माना है। 

अन्य परिणाम--  

इन राजनीतिक परिणामों के अतिरिक्त इस पराजय ने हमारे देश के धर्म व कला को भी प्रभावित किया।  भारत में इस्लाम धर्म अब दिनों दिन अपनी जड़े सुदृढ़ बनाने लगा।  हिंदू लोग जबरन मुसलमान बनाए जाने लगे।  उनके देवालय धराशाही तथा देव मूर्तियां खंडित की जाने लगी।  इसके परिणाम स्वरुप हिंदुओं की धर्म में आस्था कम होने लगी।  देवालयों के धराशाई होने से भारतीय स्थापत्य कला को भारी धक्का लगा।  उनके स्थान पर मस्जिदों के निर्माण में भारत भूमि पर एक नवीन श्रेणी की स्थापत्य कला का सृजन होने लगा।  देव मूर्तियों के खंडित करने से मूर्तिकला का ह्रास हुआ।  इन सबके अलावा भारत की भूमि पर एक नवीन सभ्यता का प्रारंभ हुआ, जिसने हिंदू सभ्यता को काफी प्रभावित किया।  इस प्रकार हम देखते हैं कि इस पराजय ने मुसलमानों के लिए भारत के द्वार खोल दिए और उनके आगमन से भारत में नाना प्रकार के प्रभाव लक्षित होने लगे।

कन्नौज पर विजय--  

तराइन के दूसरे युद्ध में कन्नौज के राजा जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मुहम्मद गौरी को सहायता का वचन दिया था और पृथ्वीराज को हराने में उसका हाथ ही रहा। 1194 ईस्वी में जयचंद को  अपनी इस करनी का फल भोगना पड़ा।  मोहम्मद ने कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ जयचंद को चंदावर ( आधुनिक फिरोजाबाद से 2 मील दूर) के युद्ध में परास्त कर दिया।  जयचंद युद्ध में मारा गया।  इस प्रकार उत्तरी भारत का दूसरा प्रतापी एंड शक्तिशाली हिंदू नरेश भी समाप्त हो गया।  डॉक्टर एस आर शर्मा के शब्दों में, “ वह (मोहम्मद) इस विजय से भारत की राजनीतिक तथा धार्मिक राजधानियों- कन्नौज व बनारस का स्वामी बन गया।” इस विजय के उपरांत मोहम्मद बनारस गया।  बनारस जयचंद का प्रिय निवास स्थान था।  वहां से जयचंद के खजाने को 1400 ऊंटों पर लादकर वह गजनी के लिए रवाना हुआ। जयचंद की इस भीषण पराजय के साथ ही गहडवाल साम्राज्य की इतिश्री हो गई और बहुत से गहडवाल (राठौड़) भागकर जोधपुर की ओर आ गए, जहां की उन्होंने अपने नवीन जोधपुर राज्य की स्थापना की। इस विजय के उपरांत मोहम्मद न 1195- 96 ईसवी में भारत पर पुनः आक्रमण किया।  इस बार उसने बयाना पर अधिकार कर लिया तथा ग्वालियर के नरेश को वार्षिक कर देने को बाध्य किया।  इस विजय के उपरांत उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने बुंदेलखंड व कालिंजर पर अधिकार कर लिया और मोहम्मद के सेनापति मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने अवध व् उत्तरी बिहार पर अधिकार कर लिया। 1197 ईस्वी में उसने समस्त बिहार पर अधिकार कर 1199 ईसवी बंगाल पर धावा बोल दिया।  बंगाल नरेश लक्ष्मण सैन ने वीरता से मुकाबला किया, पर वह लखनौती को मुसलमानों की अधिकता से नहीं बचा सका। मुसलमानों की पूर्वी भारत की विजय का सबसे बुरा प्रभाव बौद्ध धर्म पर पड़ा।

Note :-अगली कड़ी में हम राजपूतों की सिलसिलेवार पराजय के कारणों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

Saturday, September 16, 2017

The invasions, causes and effects of the Turks on India-Part 2

Turk Ruler
Muhhamad Gajnvi

Continues.... 

महमूद के आक्रमण के प्रभाव--महमूद गजनबी (998- 1030 ईस्वी)

महमूद के 17 आक्रमणों का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा? इस पर भी इतिहासकार विभिन्न मत रखते हैं।  डॉक्टर ईश्वरी प्रसाद लिखते हैं, “ उसके आक्रमणों का ध्येय धन, राज्य नहीं; मूर्ति पूजा का विनाश, विजय नहीं था; और जब वह उसे प्राप्त हो गया तो उसने भारत की असंख्य जनता की कोई  परवाह नहीं की।  भारत भूमि पर साम्राज्य स्थापित करने की उसकी इच्छा नहीं थी।अतः उसके आक्रमणों का भारत पर स्थाई प्रभाव पड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता।  परंतु आक्रमण के प्रभाव एक ही पक्ष पर दृष्टिगत नहीं होते।  हो सकता है इन आक्रमणों से भारत अधिक प्रभावित नहीं हुआ, पर गजनी का राज्य को प्रभावित हुआ।  इसलिए  स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तकभारत की खोजमें लिखा है कि  महमूद के आक्रमण भारत के इतिहास में एक बड़ी घटना है।  मैं यहां इन  प्रभावों का वर्णन दो वर्गों में करूंगा।  प्रथम वे प्रभाव जो तुर्क साम्राज्य पर पड़े, दूसरे वे प्रभाव जो भारत पर दृष्टिगत हुए।

तुर्की साम्राज्य पर पड़ने वाले प्रभाव

  1. महमूद को भारत से अतुल धन मिला, जिसके परिणाम स्वरुप वह एक विशाल सेना रख सका तथा उस सेना के सहारे वह अपना साम्राज्य सुरक्षित रख सका तथा उसे विस्तृत भी कर सका।  इस धन के सहारे वह अपने सैनिकों में हिंदुओं के विरुद्ध लड़ने का नवीन उत्साह उत्पन्न कर सका। 
  2. गजनी को महमूद ने अलंकृत भी भारतीय आक्रमणों के उपरांत ही किया।  भारत विजय से मिला धन उसने गजनी में सुंदर इमारतों के निर्माण में लगाया तथा बंदी रूप में ले जाए गए भारतीय चतुर कारीगरों ने उन सुंदर इमारतों का निर्माण किया। 
  3. गजनी ने साहित्य का भी विकास किया।  भारत से प्राप्त धन से महमूद ने अपने दरबार में अच्छे साहित्यक मनुष्यों को आश्रय दिया। महमूद को भारत से अच्छे हाथी मिले, जिनकी सहायता से वह अपना साम्राज्य सुरक्षित रख सका तथा उसे विस्तृत कर सका। 
  4. पंजाब गजनी साम्राज्य में मिला लिया गया।  इससे महमूद का साम्राज्य विस्तृत तो हुआ ही, पर साथ में उसने मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए भारत में आश्रय लेने का स्थान पंजाब को बना दिया।  
  5. पंजाब में रहकर मुसलमान भारत पर आक्रमण करने की योजना बना सकते थे तथा भारत में परास्त होने पर भी यहां से भागकर वहां शरण ले सकते थे। 
  6. मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए भारत का द्वार खुल गया।  महमूद के आक्रमणों के उपरांत भारत पर निरंतर उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक मुसलमानों के हमले होते ही रहे।

भारत पर पड़ने वाले प्रभाव--मुसलमानों का भारत से प्रथम संपर्क

  1. मुल्तान और पंजाब के प्रदेश मुसलमानों के दिन हो गए।  इससे देश की सुरक्षा संकट में पड़ गई।  डॉक्टर मजूमदार लिखते हैं--” भारतीय शासन तंत्र में अनेकों दरारें गई और अब प्रश्न केवल समय का रहा, कब वह राज्य धराशाई हो जाएगा। “ 
  2. आक्रमणों से अन्य मुस्लिम आक्रांताओं को भारत विजय सुगम हो गई।  महमूद के आक्रमण काल में उत्तरी भारत में अनेक मुसलमान विद्वान तथा धर्म प्रचारक आकर बस गए, जो कालांतर में गुप्तचर बन गए तथा भारत की खबर मुस्लिम आक्रांताओं को देते रहे। 
  3. भारतवासियों की धर्म में श्रद्धा कम हो गई।  वे भगवान में आस्था नहीं रखने लगे। वे नास्तिक वह निर्गुण पंथी होने लग गए।  इनके अलावा मूर्ति पूजा का भी ह्रास हुआ। 
  4. इन आक्रमणों से भारत की स्थापत्य कला तथा मूर्तिकला का पतन हुआ। महमूद ने वर्षों से निर्मित प्राचीन कला पूर्ण  देवालयों को धराशाई कर दिया तथा उन पर की गई कलापूर्ण कृतियों को भी नष्ट करा दिया।  
  5. मुसलमानों के भय से सुंदर  एवं कलापूर्ण देवालयों का निर्माण होना बंद हो गया।  इसके अलावा मुसलमानों द्वारा निरंतर मूर्तियों का भंजन करने से हिंदू  शिल्पियों ने देव मूर्तियों का घड़ना बंद कर दिया। 
  6. भारत की अतुल धनराशि के बाहर चले जाने से भी भारत की आर्थिक अवस्था दयनीय हो गई और देश की सुरक्षा संकटग्रस्त हो गई। 
  7. भारत पर इन आक्रमणों के उपरांत मुस्लिम सभ्यता अपना रंग दिखाने लगी।  
  8. भारी संख्या में हिंदू मुसलमान बनाए जाने लगे।  
  9. इन सब का परिणाम यह हुआ कि भारतीय सभ्यता संस्कृति को एक विदेशी सभ्यता का कटु आघात सहना पड़ा।

महमूद का मूल्यांकन--

महमूद का मूल्यांकन दो दृष्टियों से किया जाता है। भारतीय इतिहासकार हिंदुओं ने उसे धर्मांध बताया है। भारतीय हिंदू इतिहासकारों ने उसे एक लुटेरे की संज्ञा दी है, जबकि मुस्लिम इतिहासकारों ने उस की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। हमें इन दोनों दृष्टियों के मध्यम को मार्ग ग्रहण करके विश्लेषण करना चाहिए। ऐसा दृष्टिकोण अपनाने पर ही हम उसके गुण अवगुण की सही समीक्षा कर सकते हैं। उस में निम्नलिखित गुण थे।
  1. कुशल सेनानायक-- महमूद के जीवन के अन्य पहलुओं पर इतिहासकार विभिन्न मत रख सकते हैं, पर उसके कुशल सेनानायक होने में किसे भी संदेह नहीं है।  भारत पर उसने 17 आक्रमण किए।  इन सब आक्रमणों में वह स्वयं सेनापति रहा और समस्त युद्धों में उसने अपूर्व सफलता भी प्राप्त की।  उसकी सोमनाथ विजय पर डॉक्टर ईश्वरी प्रसाद लिखते हैं-” राजस्थान की रेतीली भूमि से होते हुए सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण करना उसके दृढ़ निश्चय, मानसिक शक्ति और कठिनाइयों के सामने अधिक साहस को सिद्ध करता है।अदम्य उत्साही होना एक सफल सेनानायक का गुण समझा जाता है।  उसके इस अपूर्व गुण के विषय में डॉक्टर एल श्रीवास्तव इस प्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं-”  महमूद वीर सैनिक तथा महान सेनानायक था।  कहा जाता है उसमें असाधारण व्यक्तिगत पराक्रम था,किन्तु वह निर्भिक तथा साहसी था।अंग्रेज इतिहासकार लेनपूल ने भी उसके अदम्य उत्साह है तथा सफल सेनानायक के गुणों की प्रशंसा की है।  डॉक्टर एस एम जफर भी महमूद को सफल सेनानायक उच्च कोटि का सेनानी मानते हैं।
  2. उदार एवं सफल प्रशासक-- महमूद की गणना एशिया के महानतम मुस्लिम शासकों में की जाती है। यद्यपि उसका साम्राज्य खलीफा से भी अधिक विस्तृत था तथापि उसके उस विशाल राज्य में शांति सुव्यवस्था थी।  मध्यकालीन अन्य शासकों की भांति वह एक स्वेच्छाचारी शासक था।  मंत्री उसकी इच्छा पर निर्भर रहते थे।  उनकी नियुक्ति तथा उनके पद से हटाना उसकी इच्छा पर निर्भर रहता था।  राज्य की कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका का वह प्रमुख था।  उसके अधिकारों पर केवल दो ही अंकुश थे-- परंपरागत मुस्लिम कानून और सैनिक विद्रोह की आशंका।  धार्मिक कट्टरता उसके प्रशासन में बाधा प्रस्तुत नहीं करती थी।  वह अपने कर्तव्य पालन की ओर सदेश जागरुक रहता था।  यह सही है कि भारत में वह क्रूर आक्रांता सिद्ध हुआ, स्वभाव से वह  उदार था।  अपनी जनता की रक्षा करना वह अपना परम धर्म समझता था।
  3. न्याय प्रिय-- महमूद एक न्याय प्रिय शासक था।  न्याय संपादन में वह किसी का पक्षपात नहीं करता था।  उसकी न्यायप्रियता के विषय में कई दंत कथाएं प्रचलित है। सल्जूक वजीर  निजाम उल मुल्क उसके विषय में लिखता है--” महमूद न्याय प्रिय शासक था, विद्या प्रेमी और उदार स्वभाव तथा शुद्ध धार्मिक विचारों का व्यक्ति था।न्याय में वह कट्टरता पसंद करता था।  बेईमान व्यापारी उसके दंड से नहीं बच सकते थे।  न्याय में वह किसी का भी पक्षपात नहीं करता था।  अपने दुराचारी भतीजे को मृत्युदंड देने  मैं वह तनिक नहीं हिचका।
  4. मानव चरित्र का पारखी-- डॉक्टर आशीर्वाद लाल का कहना है कि महमूद माननीय चरित्र का अच्छा पारखी था।  वह अपने अनुयाई तथा सैनिकों के गुण को भलीभांति समझता था।  मानव चरित्र का पारखी होना एक सफल नेता राजनीतिज्ञ का गुण माना जाता है। वह अपने इसी अपूर्व गुण के कारण इतनी विशाल एवं सुसंगठित सेना का गठन कर सका और साथ में सैनिकों में इस्लाम के प्रसार के लिए उनमें नवीन उत्साह उत्पन्न कर सका।
  5. साम्राज्यवादी-- यह सही है कि उसके भारत के आक्रमण इस तथ्य को प्रमाणित नहीं करते कि वह साम्राज्यवादी था; परंतु पंजाब को तुर्की साम्राज्य में सम्मिलित करना उनके इस उद्देश्य को स्पष्ट प्रतीक है।  इसके अतिरिक्त भारत से प्राप्त अतुल धर्म को उसने विशाल सेना के गठन में व्यय किया,ताकि सेना की सहायता से एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया जा सके।  भारत से हाथी भी वह मध्य एशिया में अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ही ले गया था।  उसने अपने पिता से विरासत में केवल गजनी और खुरासान की प्रदेश ही प्राप्त किए थे।  डॉक्टर आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव का कहना है कि उसने स्वयं  अपने बाहुबल से इस विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था। वह एक विशाल साम्राज्य का स्वामी था, जो इराक तथा कैस्पियन सागर से गंगा तक विस्तृत था और बगदाद के खलीफा से भी कहीं अधिक विशाल था।  उसके विशाल साम्राज्य के आधार पर वूल्जले हेग ने भी उसे महान सुलतान माना है।
  6. कलाप्रेमी तथा विद्वानों का संरक्षक-- यद्यपि महमूद समय पढ़ा लिखा नहीं था तथापि वह कला प्रेमी था।   गजनी को उसने, मस्जिदों, विद्यालय तथा समाधियों से अलंकृत किया। डॉक्टर एस आर शर्मा उसके कला प्रेम के विषय में इस प्रकार लिखते हैं--” जैसा कि साथ शताब्दियों बाद फ्रांस का लुई 14  ने किया, महमूद ने अपनी राजधानी तथा दरबार को सौरमंडल का रुप दिया जिसका अधिष्ठाता सूर्य वह स्वयं था।  गजनी को सुशोभित करने के लिए उसने शिल्पी, विद्वान, कवि तथा  कलाकार विस्तृत साम्राज्य के लिए विभिन्न भागों से आमंत्रित किए थे।इतिहासकार लेन पुल भी महमूद के कला प्रेम की सराहना करते हैं तथा उसे इस क्षेत्र में नेपोलियन से भी श्रेष्ठ मानते हैं।  उनका कहना है कि नेपोलियन ने तो पेरिस को  विजित देशों की कलाकृतियों से अलंकृत किया था, पर महमूद ने तो अन्य देशों से कलाकारों को गजनी आमंत्रित कर उनकी कलाओं में गजनी को सुंदर बनाया था।  इसी प्रकार उसे साहित्यकारों तथा विद्वानों से बड़ा अनुराग था। उसने अपने दरबार में योग्य एवं विख्यात विद्वान एकत्रित किए।  वह उन विद्वानों से साहित्य तथा धार्मिक विषयों पर वाद-विवाद करता था।  अलबरूनी, फिरदौसी, अंसारी तथा फर्रुखी  उसके दरबार की देदीप्यमान रत्न थे।  उसका सचिव प्रसिद्ध इतिहासकार उत्बी था। शिक्षा प्रसार की दृष्टि से उसने गजनी में विश्वविद्यालय स्थापित किया था।
  7. उच्च कोटि का धार्मिक-- महमूद भी धार्मिक कट्टरता तो इतनी विद्यमान थी कि हिंदुओं ने तो उसे धर्मांध तथा अपना कट्टर शत्रू बताया है।  वह कुरान में पूर्ण विश्वास रखता था।  मुसीबत युद्ध में भी वह नमाज पढ़ना नहीं बोलता था। युद्ध प्रारंभ करने से पूर्व भी वह अल्लाह की इबादत करना अच्छा समझता था।  उसकी धार्मिक आस्था  की प्रशंसा करते हुए एस एम जफर लिखता है कि वह युद्ध में भी अल्लाह की इबादत करने के लिए झुक जाता था।  तथा उससे अपनी विजय के लिए प्रार्थना करता था।
  8. आचरण की उच्चता-- निसंदेह उसने इस्लाम के प्रति अपार उत्साह था।  उसने इसके प्रसार के लिए देवालयों को धराशाई किया तथा भारी संख्या में हिंदुओं का कत्लेआम किया और उंहें मुसलमान बनाया।  परंतु कोई भी इतिहासकार उसके व्यक्तिगत आचरण पर कीचड़ उछालने का साहस नहीं कर सकता।  कहीं भी उसके द्वारा किसी भी स्त्री का शील भंग करने का दृष्टांत नहीं मिलता।
  9. सफल राजनीतिज्ञ  होना-- निसंदेह महमूद उच्च कोटि का सेनानायक योद्धा था। इसके अतिरिक्त वह सफल प्रशासक भी था।  परंतु उसमें एक सफल राजनीतिज्ञ के गुणों का सर्वथा अभाव था। लेनपुल लिखते हैं, “महमूद महान सैनिक था और उसमें अपार साहस तथा अधिक शारीरिक तथा मानसिक शक्ति थी, किंतु वह रचनात्मक तथा दूरदर्शी राजनीतिज्ञ नहीं था।  हमें ऐसे किन्ही नियमों संस्थाओं अथवा शासन प्रणालियों का पता नहीं जिसकी उसने नींव डाली हो।
  10.  सुंदरता का अभाव-- कहा जाता है कि महमूद तैमूर की भांति सौंदर्य से रहित था। उसके चेहरे पर चेचक के निशान थे, जिसके कारण उसका मुख सुंदर प्रतीत नहीं होता था। परन्तु वह अपने इस प्रभाव को राजा के से हावभाव द्वारा दूर करने का प्रयास करता था। परंतु महमूद अपने आभाव से भली भांति परिचित था और उसे यह अभाव अखरता था।  इसीलिए एक दिन उसने अपने मंत्रियों से कहा भी था कि राजा के व्यक्तित्व से उसके दर्शकों की आंखें चकाचौंध हो जानी चाहिए।  पर प्रकृति मेरे पर इतनी निष्ठुर रही है कि मेरा व्यक्तित्व देखने योग्य नहीं रखा है।

क्या महमूद लुटेरा था?-- 

महमूद के चरित्र के दो पक्ष थे।  हिंदुओं ने उसे निर्दयतापूर्वक मंदिर को लूटने वाला लुटेरा कहा है जबकि मुसलमान इतिहासकारों ने उसे एक सुदृढ़ प्रशासक माना है। स्वभाव से उसे धन से अपार मोह था।  अतः उसकी उपलब्धि के लिए वह है हर प्रकार के संभव प्रयास कर सकता था।  भारत पर उसके आक्रमण करने का एक प्रमुख कारण भारत का धन भी था।  वह यहां राज्य को स्थापित करना नहीं चाहता था और राज्य स्थापना की दृष्टि से सोमनाथ का मंदिर इतना महत्वपूर्ण नहीं था। सोमनाथ का अतुल धन ही आकर्षण मूल कारण था। इस धन की लिप्सा से वह इतना आतुर हो उठा कि राजस्थान के रेगिस्तान की भी चिंता नहीं करता हुआ वह वहां जा पहुंचा और उस मंदिर को उसने बुरी तरह से लूटा। कन्नौज, मथुरा कांगड़ा पर भी उसने आक्रमण अपने इस उद्देश्य पूर्ति हेतु ही किए थे।  मथुरा के देवालयों से उसे बड़ी मात्रा में धन मिला। कन्नौज कांगड़ा में भी उसने बहुत लुटा। यहां के राज परिवारों से तो उसने धन प्राप्त किया ही- पर वहां के नागरिक भी उस की लूट से बच सके।  जयपाल को बंदी के रुप में पाकर सर्वप्रथम उसकी दृष्टि उसके बहुमूल्य कंठहार पर पड़ी।  राजा के अलावा उसके बन्दी सामंत भी धन के लोभी महमूद से इसी प्रकार लूटे गए।  उसकी इस रुट की मनोवृत्ति को स्वीकार करते हुए डॉक्टर आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव लिखते हैं--” उस युग के भारतीय महमूद को शैतान का अवतार मानते थे।  उनकी दृष्टि में वह एक साहसी डाकू, लालची लुटेरा, तथा कला का निर्दयी शासक था; क्योंकि उसने हमारे दर्जनों समृद्धिशाली नगरों को लूटा तथा अनेक मंदिरों को जो कला के आश्चर्यजनक आदर्श थे,  धूल में मिला दिया।

परंतु इतिहासकारों की यह मान्यता है कि उस के भारत आक्रमण उसके द्वारा देवालयों को लूटना आदि पर आधारित है।  इसके विपरीत दूसरे इतिहासकार उसे लूटेरा ने मानकर एक राजनीतिज्ञ एक दूरदर्शी मानते हैं।  उनका कहना है कि वह जानता था कि बिना धन के विशाल सेना का गठन नहीं हो सकेगा और बिना विशाल सेना के वह विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं कर सकेगा।  इस कारण उसने इतना धन संग्रह किया।  यह धन उसने भारत के देवालयों से नहीं, वरुन मध्य एशिया से भी प्राप्त किया था।  इसके अलावा उसने धन के सहारे गजनी का गौरव भी बढ़ाया।  भारत से प्राप्त धन से उसने बलबन की भांति अपने दरबार का गौरव इतना बढ़ाया कि मध्य एशिया के अन्य सुल्तान भी उसे अपने से उच्च मानने लगे थे।  उस काल में सैनिकों में युद्ध के लिए उत्साह उत्पन्न करने का साधन भी धन ही था। यदि वह अपने सैनिकों को लूटने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता तो संभव है कि इतने सैनिक उसके साथ भारत नहीं आते और मैं वह इतनी उत्साह से युद्ध ही करते। यहां से लूट का माल ले जाकर मुसलमान गजनी में अपने जीवन को सुखद रूप में व्यतीत करते थे। अतः यह तो सत्य है कि महमूद लोभी था तथा वह सदैव धन के पीछे पड़ा रहता था।  पर यह कहे कि उसने भारत का धन इसीलिए लूटा क्योंकि वह लुटेरा था तो सही नहीं जान पड़ता। इसके साथ ही हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि उसकी इस लूट के पीछे उसके राजनीतिक विचार भी थे।

क्या महमूद धर्म का कट्टर था?-- 

महमूद का भारत आने का उद्देश्य एक आक्रमणकारी के रूप में तो था ही, पर वह यहां एक धर्म प्रचारक के रुप में भी आया था। उसने खलीफा को भारत में प्रति वर्ष आक्रमण करने का वचन दिया था। इससे स्पष्ट है कि वह भारत में इस्लाम का प्रसार करके अपने को इस्लाम का सच्चा सेवक सिद्ध करना चाहता था। भारत के आक्रमण उसके साम्राज्य विस्तार की नीति पर आधारित थे।  उसके आक्रमण युद्ध भूमी योद्धाओं तक ही सीमित नहीं रहते थे। जैसे ही हिंदू नरेश युद्ध में परास्त होता, महमूद उसके सैनिक वहां के देवालयों पर टूट पड़ते पर। देवालयों का सर्वस्व लूट लेते थे।  कई इतिहासकार देवालयों की लूट के पीछे उसका राजनीतिक उद्देश्य बता देते हैं। पर् देवालयों की मूर्तियों को तोड़ने में उसका क्या राजनीतिक उद्देश्य था? मूर्तियों को तोड़ कर वह उन्हें गजनी भिजवा दिया करता था।  सोमनाथ की मूर्ति तोड़ते समय उसने स्पष्ट कहा था, हां मैं मूर्ति भंजक हूं।उस मूर्ति के टुकड़ों को उसने मक्का बगदाद भिजवा दिया था ताकि वहां के मुसलमान उन मूर्तियों को अपने पैरों से रौंद सके।  इसके अलावा उसने  विजित प्रदेशों के सैनिकों को बंदी ही नहीं बनाया, वरन उनका निर्दयता से कत्लेआम इसलिए किया गया कि वह हिंदू थे।  साथ में वह इस विशाल कत्लेआम से अपने मुस्लमान सैनिकों मेंजिहादके प्रति आस्था उत्पन्न कर खलीफा सेगाजीका ख़िताब प्राप्त करना चाहता था।  यह सब इस बात के स्पष्ट प्रमाण है कि वह इस्लाम धर्म का कट्टर था और भारत में इस्लाम का प्रचार करना चाहता था। इसके अतिरिक्त उसके व्यक्तिगत जीवन से भी उसकी धार्मिक कट्टरता झलकती है। वह दिन में पांच बार नमाज पढ़ता तथा रमजान के दिनों में रोजा रखता था।  यहां तक की भयंकर युद्ध के बीच भी वह नमाज पढ़ने में नहीं घबराता था।

परंतु प्रफेसर हबीब का मत है कि महमूद धर्मांध था।  उस ने भारत पर आक्रमण इस्लाम प्रसार के लिए नहीं, वरन केवल यहां के धन को लूटने के उद्देश्य से किए थे। वह लिखते हैं कि चूँकि इस्लाम लूट आतताईपन का समर्थन नहीं करता। अतः महमूद ने भारत में बर्बरतापूर्ण कृत्य करके तो इस्लाम का अपकार ही किया था। किंतु महमूद एक पवित्र मुसलमान शासक था,जो अपने धर्म के नियमों का सावधानी से पालन करता था और इस संबंध में उसके समकालीन मुसलमानों को किसी प्रकार का संदेश नहीं था। बल्कि वे उसे एक आदर्श मुस्लिम शासक मानते थे। अपने इस कथन से प्रफेसर हबीब यह सिद्ध करना चाहते हैं कि महमूद धर्म पालन में कट्टर अवश्य था, पर  धर्मांध नहीं था।

इतिहासकार एलफिंस्टन-- भी इसी मत का समर्थन करते हुए लिखते हैं--” गुजरात में इतने दीर्घकाल प्रवास तथा गुजरात को अधीनस्थ करते समय महमूद ने एक का भी धर्म परिवर्तन किया हो यह हम नहीं सुनते।  हिंदुओं को धर्म परिवर्तन करने को बाध्य करना उसका कार्य था।

महमूद की मृत्यु तथा उसके उत्तराधिकारी-- 

1030 ईस्वी में महमूद की मृत्यु हो गई।  कहते हैं कि उसके अंतिम दिन सुखद सिद्ध हुए।  साम्राज्य अति विस्तृत हो गया था और उस पर पूर्ण रुप से शांति व्यवस्था बनाए रखने में वह सफल नहीं हुआ था।  अतः उसके जीवन काल में ही उसके साम्राज्य में अराजकता घर करने लग गई थी।  भारत के लुटे माल से उसे बहुत मोह हो गया था, अतः उसने इस लोक को अत्यंत दुख पूर्ण अवस्था में छोड़ा।  महमूद का वंश उसकी मृत्यु उपरांत 150 वर्ष तक गजनी में शासन करता रहा।  परंतु उस दीर्घकाल में उसके उत्तराधिकारियों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किए।  महमूद की मृत्यु पर उसका पुत्र मसूद गजनी का सुल्तान बना।  वह महत्वकांक्षी आवश्यक था पर शराब ने उसके जीवन को नष्ट कर दिया और इसीलिए 1049 ईस्वी मैं उसका वध कर दिया गया। उसकी मृत्यु के उपरांत अनेक निर्बल सुल्तान और बने।  उन की निर्बलता का लाभ उठाकर सेल्जुक तुर्कों ने गजनी पर आक्रमण किया। ये लोग महमूद के समय उसके अधिन। सेल्जुक तुर्कों के विद्रोह के उपरांत फारस भी गजनी साम्राज्य से स्वतंत्र हो गया।  इस प्रकार महमूद के निर्बल एवं अयोग्य उत्तराधिकारियों के समय में उसका विशाल गजनी साम्राज्य दिनों-दिन विघटित होने लगा।  इन्हीं परिस्थितियों में गजनी के सुलतान बहराम का गौर के शासक से झगड़ा हो गया।  बहराम ने गौर के राजकुमार का वध करवा दिया था।  इस झगड़े का अंत में यही परिणाम निकला कि 1173 इसवी में गजनी पर गौर के सुर अफगानों का आधिपत्य स्थापित हो गया और महमूद के वंश का सूर्य गजनी में सदा के लिए अस्त हो गया। 

End of the